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एनसीबी के ऑपरेशन RAGEPILL के बाद जागा एफडीए, अवैध फैक्ट्रियों पर नकेल कसने की तैयारी तेज

देहरादून: देश भर में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) का ऑपरेशन ‘रेजपिल’ चर्चाओं में बना हुआ है. इस ऑपरेशन के बाद अब उत्तराखंड का खाद्य संरक्षा एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) भी पूरी तरह अलर्ट मोड में आ गया है. अंतरराष्ट्रीय ड्रग सिंडिकेट के खिलाफ चलाए गए इस बड़े अभियान में करीब 182 करोड़ रुपये कीमत की प्रतिबंधित सिंथेटिक ड्रग कैप्टागन बरामद की गई है. इस कार्रवाई में एक विदेशी नागरिक समेत दो लोगों की गिरफ्तारी भी हुई है.

दरअसल, देहरादून जिले के सहसपुर क्षेत्र स्थित एक इकाई का नाम सामने आने के बाद खाद्य संरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि संबंधित संस्थान विभाग के रिकॉर्ड में पंजीकृत नहीं था. विभाग के अनुसार, इस यूनिट को न तो औषधि एवं प्रसाधन अधिनियम के तहत कोई निर्माण लाइसेंस जारी किया गया था और न ही एफएसएसएआई के तहत किसी प्रकार की अनुमति प्रदान की गई थी. एफडीए के अनुसार, ये मामला एनडीपीएस एक्ट के तहत प्रतिबंधित एवं कंट्रोल्ड सब्सटेंस से जुड़ा है, जिसका नियमन विभाग के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है. हालांकि, केंद्रीय एजेंसियों की ओर से पूरे मामले की जांच की जा रही है और राज्य स्तर पर भी संबंधित सूचनाओं को गंभीरता से लिया जा रहा है.

कैप्टागन एक सिंथेटिक साइकोट्रॉपिक ड्रग है, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फेनेथाइलीन आधारित उत्तेजक पदार्थ माना जाता है. पश्चिम एशिया के कई संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में आतंकी संगठनों और अंतरराष्ट्रीय ड्रग नेटवर्क के उपयोग के कारण इसे जिहादी ड्रग के नाम से भी जाना जाता है. यह लंबे समय तक जागे रहने, भय कम करने और शरीर को अत्यधिक सक्रिय बनाए रखने के लिए कुख्यात रही है. भारत में पहली बार इतनी बड़ी मात्रा में इसकी बरामदगी ने केंद्रीय एजेंसियों को भी सतर्क कर दिया है.

कैप्टागन किसी वैध औषधि की श्रेणी में नहीं आती और इसका विनियमन एफडीए के अधिकार क्षेत्र में नहीं है. ये एनडीपीएस एक्ट के तहत प्रतिबंधित पदार्थ है, जिसकी अवैध सप्लाई और तस्करी गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है. प्रदेश में बिना अनुमति संचालित निर्माण इकाइयों और संदिग्ध गतिविधियों पर लगातार निगरानी रखी जा रही है. निरीक्षण अभियान नियमित रूप से चलाए जा रहे हैं और आवश्यकता पड़ने पर स्थानीय प्रशासन एवं केंद्रीय एजेंसियों के साथ समन्वय स्थापित कर कार्रवाई की जाएगी.ताजबर सिंह जग्गी, अपर आयुक्त, खाद्य संरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग

एनसीबी की शुरुआती जांच में मामला अंतरराष्ट्रीय ड्रग सिंडिकेट से जुड़ा बताया जा रहा है. बरामद खेप को पश्चिम एशिया भेजने की तैयारी थी. ऐसे में केंद्रीय एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि सहसपुर स्थित कथित यूनिट को किन माध्यमों से संचालित किया जा रहा था और इसके पीछे कौन-कौन लोग शामिल थे. मामले के सामने आने के बाद प्रदेश में बिना लाइसेंस संचालित इकाइयों और अवैध निर्माण प्रतिष्ठानों पर निगरानी और सख्ती बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं. अपर आयुक्त ने कहा कि प्रदेश में वैधानिक अनुमति के बिना संचालित इकाइयों के खिलाफ अभियान आगे भी जारी रहेगा और ऐसे मामलों में किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी.

साथ ही कहा कि सहसपुर क्षेत्र में संचालित जिस इकाई का नाम सामने आया है, वो विभाग के रिकॉर्ड में पंजीकृत नहीं है. इस संस्थान को न तो औषधि एवं प्रसाधन अधिनियम के तहत कोई लाइसेंस जारी किया गया था और न ही एफएसएसएआई के तहत अनुमति दी गई थी. कैप्टागन जैसी प्रतिबंधित सामग्री का विभाग से कोई नियामकीय संबंध नहीं है, क्योंकि यह एनडीपीएस एक्ट के अंतर्गत कंट्रोल्ड सब्सटेंस की श्रेणी में आती है. उन्होंने कहा कि विभाग प्रदेश में बिना लाइसेंस संचालित इकाइयों के खिलाफ लगातार अभियान चला रहा है और आवश्यकता पड़ने पर स्थानीय प्रशासन एवं केंद्रीय एजेंसियों के साथ समन्वय स्थापित कर कार्रवाई की जाएगी.

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