
गैरसैंण: पेशावर कांड के महानायक एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की स्मृति में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला मेला इस वर्ष भी उनकी समाधि स्थल कोदियाबगड़ (दूधातोली) में आयोजित किया गया. जिसमें बड़ी संख्या में चमोली, पौड़ी और अल्मोड़ा जिले के सीमांत ग्रामीणों ने पहुंचकर उत्तराखंड के वीर सेनानी और सामाजिक कार्यकर्ता को श्रद्धांजलि अर्पित की.
त्तराखंड का पामीर कहा जाने वाला दूधातोली का कोदियाबगड़ बुग्याल गैरसैंण नगर से कुल 24 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. समुद्रतल से 3100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह पर्वतमाला बेहद रमणीक स्थलों में शुमार है. मध्य हिमालयी इस क्षेत्र में स्थित इस बुग्याल में कभी सैकड़ों की संख्या में अपने पालतु पशुओं के साथ यहां रहने वाले पशुपालकों द्वारा दुग्ध उत्पादन का केंद्र होने के कारण इसे दूधातोली (दूध की तौली या बर्तन) नाम दिया गया था.
गैरसैंण से 16 किलोमीटर दूर भराड़ीसैंण और दो किलोमीटर वन विभाग की सड़क से सफर करने के बाद 6 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई पार कर यहां पहुंचा जाता है. चमोली, अल्मोड़ा और पौड़ी जिलों के इस सीमांत क्षेत्र कोदियाबगड़ में चौमास (बरसात के चार माह) के दौरान यहां छपरों (कच्चे मकान) में रहने वाले पशुपालकों द्वारा सदियों से मेले का आयोजन किया जाता रहा है, जिसमें गैरसैंण, थलीसैंण और स्याल्दे ब्लॉक के पशुपालक शामिल रहते हैं. बदलते समय के साथ पशुपालन कम होने से मेले की रंगत भी फिकी पड़ती गई. लेकिन पिछले साल से मेले की खौयी रंगत लोटाने को गैरसैंण नगर पंचायत के अध्यक्ष समेत स्थानीय ग्रामीणों ने प्रयास शुरू किए हैं.
वीर चंद्र सिंह गढ़वाली और 12 जून की तारीख का संबंध: 12 जून 1930 को एबटाबाद मिलिट्री कोर्ट में कोर्ट मार्शल में हवलदार मेजर चंद्र सिंह को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी. उनके साथ 62 अन्य गढ़वाली सैनिकों का भी कोर्ट मार्शल किया गया था. इस दौरान चंद्र सिंह गढ़वाली की सारी संपत्ति जब्त कर ली गई और इनकी वर्दी को इनके शरीर से काट-काटकर अलग कर दिया गया. 16 लोगों को लंबी सजाएं हुई. 39 लोगों को कोर्ट मार्शल के द्वारा नौकरी से निकाल दिया गया. 7 लोगों को बर्खास्त कर दिया गया और इन सभी का संचित वेतन जब्त कर दिया गया. चंद्र सिंह गढ़वाली तत्काल एबटाबाद (वर्तमान में पाकिस्तान) जेल भेज दिए गए, जिसके बाद इन्हें अलग-अलग जेलों में डेरा इस्माइल खान, बरेली, नैनीताल, लखनऊ, अल्मोड़ा और देहरादून स्थानांतरित किया जाता रहा. नैनी सेंट्रल जेल (प्रयागराज) में उनकी भेंट क्रांतिकारी राजबंदियों से हुई. लखनऊ जेल में नेताजी सुभाष चंद्र बोस से भेंट हुई. बाद में इनकी सजा कम हो गई और 11 साल के कारावास के बाद इन्हें 26 सितंबर 1941 को रिहा कर दिया गया.
कौन थे वीर चंद्र सिंह गढ़वाली: पौड़ी गढ़वाल जिले के थलीसैंण ब्लॉक के मासौं गांव के रहने वाले चंद्र सिंह भंडारी प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश भारतीय सेना की प्रसिद्ध ‘रॉयल गढ़वाल राइफल्स’ का हिस्सा थे. 23 अप्रैल 1930 को पेशावर में निहत्थे पठानी स्वतंत्रता सेनानियों पर अंग्रेजों ने गोली चलाने का आदेश दिया था. तब उन्होंने अपनी देशभक्ति दिखाते हुए निहत्थे हमवतन क्रांतिकारियों पर गोली चलाने से साफ इनकार कर दिया. जिसके बाद हवलदार मेजर के रूप में उन्हें ब्रिटिश सेना से बर्खास्त कर दिया गया. उनके इस क्रांतिकारी फैसले के बाद उन्हें वीर चंद्र सिंह गढ़वाली नाम से जाना जाने लगा. सामाजिक सरोकारों से लगाव रखने वाले वीर चंद्र सिंह गढ़वाली ने सन् 1979 में अपनी मौत से पहले उन्होंने पशुपालकों के प्रिय स्थल कोदियाबगड़ में अपनी समाधी स्थापित करने की मंशा जताई थी.
