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सचिवालय कर्मियों को कर्मयोगी बनने में नहीं दिलचस्पी, कैसे पूरा होगा पीएम मोदी का मिशन?

देहरादून: भारत सरकार चाहती है कि देश में सभी आधिकारियों-कर्मचारियों की कार्यक्षमता को बढ़ाया जाए. शायद मिशन कर्मयोगी को इसी सोच के साथ शुरू भी किया गया, लेकिन उत्तराखंड सचिवालय में फिलहाल तो इस सोच पर पलीता लगता हुआ दिखाई दे रहा है. स्थिति यह है कि करीब एक महीने से भी ज्यादा वक्त में सचिवालय सेवा के अधिकतर कर्मचारी मिशन कर्मयोगी के लक्ष्य दूर नजर आ रहे हैं.

मिशन कर्मयोगी ने रूची नहीं दिखा रहे अधिकारी-कर्मचारी: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों की कार्यक्षमता बढ़ाने, उन्हें नई तकनीकों से जोड़ने और प्रशासनिक व्यवस्था को आधुनिक बनाने की बात करते रहे हैं. इसी सोच के साथ केंद्र सरकार ने मिशन कर्मयोगी की शुरुआत की थी, ताकि देशभर के सरकारी कर्मचारी बदलते दौर के अनुरूप खुद को तैयार कर सकें, लेकिन उत्तराखंड सचिवालय की स्थिति फिलहाल इस मिशन के लक्ष्य से काफी दूर दिखाई दे रही है.

अनिवार्य प्रशिक्षण पूरा नहीं कर पाए अधिकांश कर्मचारी-अधिकारी: हालात यह हैं कि सचिवालय में एक महीने से अधिक समय बीत जाने के बावजूद अधिकांश अधिकारी और कर्मचारी मिशन कर्मयोगी से जुड़ने में रुचि नहीं दिखा रहे हैं. शासन स्तर पर स्पष्ट आदेश जारी होने के बाद भी सचिवालय सेवा के बड़ी संख्या में अधिकारी और कर्मचारी अब तक अनिवार्य प्रशिक्षण पूरा नहीं कर पाए हैं. इससे सरकार की उस मंशा पर सवाल खड़े हो रहे हैं, जिसके तहत प्रशासनिक कार्यों को ज्यादा दक्ष और तकनीकी रूप से मजबूत बनाने की योजना बनाई गई थी.

केंद्र सरकार का मिशन कर्मयोगी: दरअसल केंद्र सरकार ने मिशन कर्मयोगी के तहत iGOT यानी इंटीग्रेटेड गवर्नमेंट ऑनलाइन ट्रेनिंग पोर्टल तैयार किया है. इस पोर्टल पर सरकारी कर्मचारियों के लिए सैकड़ों ऑनलाइन कोर्स उपलब्ध कराए गए हैं. इन कोर्सों का उद्देश्य कर्मचारियों की कार्य क्षमता बढ़ाना, नई तकनीकों की जानकारी देना और प्रशासनिक दक्षता विकसित करना है.

उत्तराखंड सरकार ने भी इस योजना को लागू करते हुए सचिवालय स्तर पर सभी कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए कम से कम एक कोर्स करना अनिवार्य किया है. इसके लिए शासन की ओर से बाकायदा आदेश जारी किए गए. कर्मचारियों को अपनी e-Office आईडी के जरिए iGOT पोर्टल पर लॉगिन कर प्रोफाइल अपडेट करने और किसी एक कोर्स में नामांकन करने के निर्देश दिए गए.

मिशन कर्मयोगी की प्रगति बेहद धीमी: इतना ही नहीं कोर्स पूरा करने के बाद मूल्यांकन परीक्षा पास करने पर प्रमाणपत्र भी दिए जाने की व्यवस्था की गई है. तकनीकी सहायता के लिए सचिवालय प्रशासन और e-Office टीम को भी जिम्मेदारी सौंपी गई है, लेकिन इन तमाम व्यवस्थाओं और आदेशों के बावजूद सचिवालय में मिशन कर्मयोगी की प्रगति बेहद धीमी नजर आ रही है.

जानकारी के मुताबिक सचिवालय सेवा में करीब 1000 से अधिक अधिकारी और कर्मचारी कार्यरत हैं, लेकिन इनमें से अब तक केवल करीब 200 कर्मचारियों और अधिकारियों ने ही कम से कम एक कोर्स पूरा किया है. कुल मिलाकर लगभग 231 अधिकारी-कर्मचारी ही मिशन कर्मयोगी के लक्ष्य तक पहुंच पाए हैं.

सचिवालय प्रशासन को जारी करना पड़ा पत्र: सबसे अहम बात यह है कि सचिवालय प्रशासन की ओर से हाल ही में एक पत्र भी जारी किया गया है, जिसमें स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि मिशन कर्मयोगी के तहत अपेक्षित प्रगति नहीं हो पा रही है. यानी शासन स्तर पर भी यह माना जा रहा है कि अधिकारी और कर्मचारी प्रशिक्षण कार्यक्रमों को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं. हालांकि कुछ अधिकारी ऐसे भी हैं, जिन्होंने न सिर्फ एक बल्कि एक से अधिक कोर्स पूरे किए हैं और खुद को नई प्रशासनिक जरूरतों के अनुरूप विकसित करने की कोशिश की है, लेकिन कुल संख्या के मुकाबले यह आंकड़ा बेहद कम है.

सचिवालय प्रशासन की ओर से जारी सूची में कई वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों के नाम भी शामिल हैं, जिन्होंने मिशन कर्मयोगी के तहत कोर्स पूरे किए हैं. इनमें आनंद स्वरूप, रणजीत सिन्हा, सी रविशंकर, विनोद कुमार सुमन, श्रीधर बाबू अदाकी, सुरेंद्र पांडे, राजेश कुमार, रणवीर सिंह चौहान, सचिन कुर्वे और उमेश नारायण पांडे जैसे अधिकारी शामिल हैं.

कर्मचारी और अन्य अधिकारी क्यों दूर? इन अधिकारियों द्वारा कोर्स पूरा करना यह दिखाता है कि यदि इच्छा हो तो व्यस्त प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बीच भी प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लिया जा सकता है, लेकिन सवाल यह है कि जब सचिव स्तर के अधिकारी इस पहल का हिस्सा बन सकते हैं तो बड़ी संख्या में कर्मचारी और अन्य अधिकारी इससे दूरी क्यों बनाए हुए हैं.?

कर्मचारियों को खुद को अपडेट करना जरूरी: सरकारी तंत्र में लगातार डिजिटल बदलाव हो रहे हैं. फाइलों का निस्तारण, ई-ऑफिस सिस्टम, डेटा प्रबंधन और ऑनलाइन प्रशासनिक प्रक्रियाएं तेजी से बढ़ रही हैं. ऐसे में कर्मचारियों को नई तकनीकों और आधुनिक प्रशासनिक प्रक्रियाओं का प्रशिक्षण मिलना बेहद जरूरी माना जा रहा है. यदि सरकारी कर्मचारी समय के साथ खुद को अपडेट नहीं करेंगे तो प्रशासनिक व्यवस्था की गति प्रभावित हो सकती है.

मिशन कर्मयोगी को इसी सोच के साथ तैयार किया गया था कि सरकारी कर्मचारी केवल पारंपरिक तरीके से काम करने तक सीमित न रहें, बल्कि तकनीकी रूप से दक्ष और परिणाम आधारित कार्य संस्कृति विकसित करें.

उत्तराखंड सरकार ने SOP भी जारी की थी: उत्तराखंड सरकार भी चाहती है कि राज्य के कर्मचारी आधुनिक प्रशासनिक जरूरतों के अनुरूप खुद को तैयार करें. यही वजह है कि मिशन कर्मयोगी के तहत ऑनलाइन प्रशिक्षण को अनिवार्य बनाया गया है. इसके लिए SOP यानी स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर भी तैयार किया गया है, ताकि कर्मचारियों को पोर्टल इस्तेमाल करने में किसी तरह की दिक्कत न हो. इसके बावजूद यदि कर्मचारी इस मौके का लाभ नहीं उठा रहे हैं तो यह चिंता का विषय माना जा रहा है. क्योंकि सरकार का मानना है कि प्रशिक्षण केवल औपचारिकता नहीं बल्कि भविष्य की प्रशासनिक जरूरत है.

आने वाले समय में सरकारी कामकाज में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल प्रोसेसिंग और स्मार्ट गवर्नेंस की भूमिका और बढ़ने वाली है. ऐसे में कर्मचारियों की स्किल डेवलपमेंट बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है. करीब 2 अप्रैल को सचिवालय स्तर पर आदेश जारी किए गए थे, लेकिन एक महीने से अधिक समय बीतने के बाद भी जिस स्तर की भागीदारी की उम्मीद थी, वह दिखाई नहीं दे रही है. अब देखने वाली बात यह होगी कि सचिवालय प्रशासन इस अभियान को गति देने के लिए आगे क्या कदम उठाता है और क्या आने वाले दिनों में अधिकारी और कर्मचारी मिशन कर्मयोगी को गंभीरता से लेते हैं या नहीं.

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