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‘HC के रजिस्ट्रार जनरल खुद से डिसिप्लिनरी एक्शन शुरू नहीं कर सकते’, उत्तराखंड ज्यूडिशियल ऑफिसर बहाली मामला

दिल्ली/देहरादून: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 18 मई सोमवार को उत्तराखंड की एक ज्यूडिशियल अफसर की बहाली में दखल देने से मना कर दिया है. अधिकारी को हरिद्वार में पोस्टिंग के दौरान उनकी नाबालिग घरेलू सहायिका को टॉर्चर करने के आरोप में नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था. इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने की.

जज की तरफ से पेश वकील ने दलील दी कि, डिसिप्लिनरी एक्शन शुरू करने के लिए उत्तराखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से कोई मंजूरी नहीं ली गई थी. जज ने यह भी आरोप लगाया था कि सीनियर ज्यूडिशियल अधिकारियों ने उनके खिलाफ साजिश रची थी. बेंच इस बात पर सहमत हुई कि सबसे जरूरी मुद्दा किसी सक्षम अथॉरिटी द्वारा डिसिप्लिनरी कार्रवाई शुरू करने का कोई आदेश होना चाहिए.

जज के अधिवक्ता की तरफ से बेंच को बताया गया कि, चीफ जस्टिस (CJ) की तरफ से कोई लिखित ऑर्डर नहीं है. वहीं, हाईकोर्ट की तरफ से पेश वकील ने कहा कि, कम्यूनिकेशन से पता चलता है कि रजिस्ट्रार जनरल ने बताया था कि चीफ जस्टिस से मंजूरी उन्होंने फोन पर ली है.

बेंच ने पाया कि रजिस्ट्रार जनरल ने अपनी पावर का गलत इस्तेमाल किया, क्योंकि किसी ज्यूडिशियल ऑफिसर को तब तक चार्जशीट नहीं किया जा सकता जब तक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस इसकी मंजूरी न दें.

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने हाईकोर्ट (एडमिनिस्ट्रेटिव साइड) की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें 6 जनवरी 2026 को उसकी डिवीजन बेंच के ऑर्डर को चुनौती दी गई थी. बेंच ने कहा कि, वह पहले रेस्पोंडेंट (ज्यूडिशियल ऑफिसर) के खिलाफ की गई डिसिप्लिनरी एक्शन और उसके बाद नौकरी में उनकी बहाली को रद्द करने के लिए विवादित फैसले के ऑपरेटिव हिस्से में दखल देने के लिए तैयार नहीं हैं.

बेंच ने साफ किया कि वह ‘कानून के सवाल पर डिसिप्लिनरी कार्रवाई को नामंजूर कर रहा है, न कि उन फैक्ट्स पर जैसा कि हाईकोर्ट ने विवादित फैसले में चर्चा की है’.

ये है पूरा मामला: हरिद्वार में सिविल जज (सीनियर डिवीजन) दीपाली शर्मा को जांच और डिपार्टमेंटल कार्रवाई के बाद नौकरी से निकाल दिया गया था. जनवरी 2018 में, एक गुमनाम शिकायत में आरोप लगाया गया था कि वह एक नाबालिग लड़की को शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से परेशान कर रही थी और उसे अपने घर में घरेलू सहायिका के तौर पर रख रही थी.

शिकायत हरिद्वार के डिस्ट्रिक्ट जज को भेजी गई, जिन्होंने मौके का दौरा किया और अपनी रिपोर्ट सौंपी. रिपोर्ट में कहा गया कि नाबालिग लड़की को मेडिकल जांच के लिए ले जाया गया, जिसमें उसके शरीर पर 20 चोटें मिलीं. इसके बाद सिविल जज को सस्पेंड कर दिया गया और फिर बर्खास्त कर दिया गया.

जज शर्मा की अपील पर, हाईकोर्ट ने प्रोसेस में कई कमियां पाईं. ओरिजिनल मेडिकल सर्टिफिकेट मौजूद नहीं था, और उस पर लड़की की जांच करने वाले डॉक्टर के साइन नहीं थे. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक डिसिप्लिनरी कार्रवाई को हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस या जजों की कमिटी से मंजूरी नहीं मिल जाती, तब तक ऐसी कार्रवाई अमान्य होगी

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