19 May 2026

उत्तराखंड में प्राइमरी शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया में अनियमितता पर सुनवाई, सरकार को दिए ये आदेश

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नैनीताल: उत्तराखंड में प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया में बरती गई अनियमितताओं के मामले पर नैनीताल हाईकोर्ट में सुनवाई हुई. मामले की सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकलपीठ ने सरकार से अब तक दिए गए निर्णयों का अवलोकन करने को कहा है. पूर्व में कोर्ट ने इस मामले में कड़ी टिप्पणी की थी.

तब कोर्ट ने शिक्षा निदेशालय को नियम विरुद्ध नियुक्त शिक्षकों की सेवा में व्यवधान डाले बिना, नियुक्ति से वंचित रखे 11 अभ्यर्थियों की नियुक्ति का रास्ता निकालने के निर्देश दिए थे. कोर्ट में सुनवाई के दौरान कहा गया कि तत्कालीन निदेशक की ओर से सरकार के आदेशों का अनुपालन नहीं किया.

क्या है पूरा मामला? दरअसल, साल 2016 में हुई नियुक्ति प्रक्रिया में कई अभ्यर्थियों की नियम विरुद्ध नियुक्ति होने और 11 योग्य अभ्यर्थियों को नियुक्ति से वंचित रखे जाने का मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन है. जिसे नियुक्ति से वंचित विनय कुमार समेत अन्य ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. जिसमें शिक्षा विभाग के अलावा बड़ी संख्या में वे प्राथमिक शिक्षक प्रतिवादी हैं, जिन्हें नियुक्ति मिल गई थी.

इधर, शिक्षा विभाग ने नवंबर 2025 में सहायक अध्यापक प्राथमिक शिक्षकों की नियुक्ति के लिए विज्ञप्ति जारी की है. कोर्ट के निर्देश पर इस नियुक्ति प्रक्रिया में पूर्व में नियुक्ति से वंचित 11 अभ्यर्थियों के लिए पद रिक्त रखने के निर्देश दिए गए थे. मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने इस बात पर हैरानी जताई कि सीबीएसई और एनसीटीई की ओर से अपात्र घोषित किए जाने के बावजूद चयन समिति ने बिना योग्यता जांचे ही काफी संख्या में अपात्र अभ्यर्थियों की नियुक्ति की सिफारिश कैसे कर दी?

अदालत ने पूर्व में आदेश दिया था कि साल 2025 के विज्ञापन की 11 रिक्तियों को सुरक्षित रखा जाए. ताकि, उन योग्य याचिकाकर्ताओं को समायोजित किया जा सके, जिन्हें साल 2016 की भर्ती में अवैध करीके से नियुक्ति से वंचित कर दिया गया था. कोर्ट ने नाराजगी व्यक्त की कि विभाग बार-बार शपथ पत्र दाखिल कर अपने पुराने गलत फैसलों को सही ठहराने की कोशिश कर रहा है, जो न्यायिक निर्देशों को विफल करने जैसा है.

वहीं, ​सुनवाई के दौरान विभागीय सचिव ने सुप्रीम कोर्ट के ‘देवेश शर्मा बनाम भारत संघ’ मामले का हवाला देते हुए याचिकाकर्ताओं को बीएड डिग्री धारक होने के कारण अपात्र बताया, लेकिन याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने इसका पुरजोर विरोध करते हुए कहा कि राज्य खुद पूर्व में स्वीकार कर चुका है कि ये अभ्यर्थी 2016 के विज्ञापन के अनुसार पूरी तरह पात्र थे. उन्होंने तर्क दिया कि ये कानून उन पर लागू नहीं होता. क्योंकि, उनकी पात्रता पर पहले कोई विवाद नहीं था.

न्यायालय ने एक ‘बैलेंसिंग ऑर्डर’ (संतुलित आदेश) पारित किया है, जिसका उद्देश्य उन निजी प्रतिवादियों, जिनको नियुक्ति मिल चुकी है, उनकी सेवाओं में बाधा डाले बिना याचिकाकर्ताओं को न्याय देना है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं को उन 11 रिक्त पदों पर समायोजित किया जाए, जो विशेष रूप से इसी उद्देश्य के लिए रिक्त रखे गए थे.

राज्य सरकार को निर्देश दिया गया है कि वे इन अभ्यर्थियों को नियुक्ति देने का रास्ता निकाले. ​हाईकोर्ट ने इस मामले में उदार रुख अपनाते हुए अधिकारियों को आदेश के अनुपालन या कानूनी रास्ता निकालने के लिए कहा था. उसके बाद भी भ्रामक हलफनामा पेश किया जा रहा है. वहीं, कोर्ट ने अब सरकार से अब तक दिए गए निर्णयों का अवलोकन करने को कहा है.

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