26 July 2026

कड़क स्वभाव, ईमानदार छवि, रोडमैन की पहचान, जानिये कैसे लोकप्रिय हुये बीसी खंडूड़ी

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देहरादून: उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल सेवानिवृत्त भुवन चंद्र खंडूड़ी का मंगलवार को निधन हो गया. वे लंबे समय से बीमार थे. देहरादून के अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था. उनके निधन की खबर आते ही उत्तराखंड ही नहीं पूरे देश की राजनीति में शोक की लहर दौड़ गई है. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी समेत कई नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी. उन्होंने कहा खंडूड़ी का योगदान उत्तराखंड के विकास और साफ-सुथरी राजनीति के लिए हमेशा याद रखा जाएगा.

सेना की वर्दी से राजनीति तक का सफर: 1 अक्टूबर 1934 को देहरादून में जन्मे भुवन चंद्र खंडूड़ी का जीवन अनुशासन सादगी और राष्ट्रसेवा की मिसाल माना जाता है. उनके पिता जय बल्लभ खंडूड़ी पत्रकार थे. उनकी मां दुर्गा देवी सामाजिक कार्यों से जुड़ी थीं. खंडूड़ी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय और सैन्य संस्थानों से शिक्षा प्राप्त की. उसके बाद भारतीय सेना की इंजीनियर्स कोर में शामिल हो गए. करीब 36 वर्षों तक सेना में सेवा देने के दौरान उन्होंने अपनी कड़क कार्यशैली और ईमानदार छवि से अलग पहचान बनाई.

1982 में उन्हें अति विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित किया गया. सेना से रिटायर होने के बाद उन्होंने राजनीति का रास्ता चुना. कहा जाता है कि अटल बिहारी वाजपेयी ने उनकी प्रशासनिक क्षमता और साफ छवि को देखते हुए उन्हें सक्रिय राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया. इसके बाद उन्होंने भाजपा के साथ अपना लंबा राजनीतिक सफर शुरू किया. वे कई बार गढ़वाल से सांसद चुने गए. वे केंद्र सरकार में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री भी रहे.

सड़क वाले मंत्री के नाम से पहचान: देश में जब राष्ट्रीय राजमार्गों और ग्रामीण सड़कों का बड़ा नेटवर्क तैयार हो रहा था उस दौर में खंडूड़ी केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय संभाल रहे थे. प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना को गति देने और सड़क परियोजनाओं में तेजी लाने का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है. पहाड़ी राज्यों में सड़क संपर्क सुधारने को लेकर उनकी विशेष रुचि थी. उत्तराखंड के लोग अक्सर कहते थे कि खंडूड़ी जहां जाते थे वहां सड़क पहुंच जाती थी. यही वजह थी कि उन्हें कई लोग प्यार से रोडमैन भी कहते थे.

उत्तराखंड के कड़क मुख्यमंत्री थे खंडूड़ी: 2007 में भाजपा को उत्तराखंड में बहुमत मिला. भुवन चंद्र खंडूड़ी मुख्यमंत्री बने. मुख्यमंत्री के रूप में उनकी छवि बेहद सख्त और ईमानदार प्रशासक की रही. वे फाइलों में देरी पसंद नहीं करते थे. अफसरों को समय पर काम पूरा करने की हिदायत देते थे. भ्रष्टाचार के खिलाफ खुलकर बोलते थे.

उनके बारे में एक मशहूर किस्सा अक्सर सुनाया जाता है कि एक बैठक में उन्होंने अधिकारियों से कहा था सरकारी कुर्सी आराम के लिए नहीं जिम्मेदारी के लिए होती है. उनके इस रवैये से कुछ लोग असहज भी होते थे, लेकिन, आम जनता के बीच उनकी साफ छवि ने उन्हें अलग सम्मान दिलाया. उनके कार्यकाल में ट्रांसफर पोस्टिंग की राजनीति पर नियंत्रण की कोशिशें हुईं. यही कारण था कि उन्हें ईमानदार लेकिन सख्त मुख्यमंत्री कहा जाता था. उनकी यही सख्ती कई बार पार्टी के भीतर असंतोष का कारण भी बनी. 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के खराब प्रदर्शन के बाद उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया.

हार के बाद भी नहीं टूटा आत्मविश्वास: 2011 में पार्टी ने फिर उन्हें मुख्यमंत्री बनाया. 2012 का विधानसभा चुनाव उनके राजनीतिक जीवन का सबसे कठिन दौर साबित हुआ. वे खुद कोटद्वार सीट से चुनाव हार गए. इसके बावजूद उनकी व्यक्तिगत छवि पर कभी बड़ा दाग नहीं लगा. राजनीति में विरोधी दलों के नेता भी उनकी ईमानदारी की तारीफ करते थे. उत्तराखंड की राजनीति में अक्सर यह कहा जाता था अगर सिस्टम में खंडूड़ी जैसे दो-चार नेता और होते तो तस्वीर अलग होती यह बात उनकी सार्वजनिक छवि को समझने के लिए काफी मानी जाती है.

निजी जीवन में बेहद सादगी: भुवन चंद्र खंडूड़ी का जीवन बेहद सादा था. वो दिखावे से दूर रहते थे. वरिष्ट पत्रकार सुनील दत पांडे बताते हैं कि मुख्यमंत्री रहने के दौरान भी उनका रहन-सहन एक सामान्य फौजी अधिकारी जैसा था. समय की पाबंदी इतनी सख्त थी कि अगर कोई बैठक में देर से पहुंचे तो वे सीधे नाराजगी जता देते थे. उनकी बेटी ऋतु भूषण खंडूड़ी आज उत्तराखंड विधानसभा अध्यक्ष हैं. परिवार भी लंबे समय से सार्वजनिक जीवन और राजनीति से जुड़ा रहा है.

लंबे समय से चल रहे थे बीमार: पिछले कुछ वर्षों से उनकी तबीयत लगातार खराब चल रही थी. 2025 में उनकी ब्रेन सर्जरी भी हुई थी. तब मुख्यमंत्री धामी समेत कई नेता उनका हाल जानने अस्पताल पहुंच रहे थे. बाद में उनकी हालत में कुछ सुधार हुआ लेकिन उम्र संबंधी समस्याओं के कारण वे सक्रिय राजनीति से दूर हो गए थे.

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