ढाई साल बाद फिर चर्चाओं में चीला रेंज हादसा, वनकर्मियों को अभी तक नहीं मिला शहीद का दर्जा
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देहरादून: पूरे देश में वन शहीदों की याद में आज श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं. उत्तराखंड में भी शहीद स्मारक पर शहीदों को श्रद्धांजलि देकर पुष्प अर्पित किए गए. इस दौरान राजाजी टाइगर रिजर्व की वह घटना ताजा हो गई, जिसमें कई वन कर्मियों ने अपनी जान गंवाई थी. वन कर्मियों की मौत के ढाई साल बाद भी ना तो इनके नाम शहीदों की लिस्ट में शामिल हो सके और ना इस दुर्घटना की जिम्मेदारी तय की जा सकी है.
उत्तराखंड के राजाजी टाइगर रिजर्व में गाड़ी के ट्रायल के दौरान एक साथ कई वन विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों ने जान गंवाई. शायद यह देश का एक अकेला मामला होगा, जहां एक साथ इतने वन विभाग के अधिकारी और कर्मचारी ड्यूटी के दौरान मारे गए. इस दुर्घटना में एक निजी कंपनी के कर्मचारी के अलावा 5 वन कर्मी मारे गए.
हैरत की बात यह है कि यह घटना जनवरी की शुरुआत में साल 2024 के दौरान हुई लेकिन 2026 में सितंबर महीने तक भी इस दुर्घटना को लेकर संशय के बादल नहीं छट पाये हैं. स्थिति यह है कि दुर्घटना को लेकर वन विभाग के भीतर भारी आक्रोश के बावजूद ना तो किसी अधिकारी की जिम्मेदारी तय करते हुए उसे पर कार्रवाई हो पाई है और ना ही मरने वाले वन कर्मचारी के परिजनों को लाभ दिया जा सका है.
राजाजी टाइगर रिजर्व में इस दुर्घटना के दौरान निदेशक के तौर पर साकेत बडोला जिम्मेदारी देख रहे थे. हालांकि इस दुर्घटना के बाद उन्हें और भी महत्वपूर्ण मानी जाने वाली कॉर्बेट टाइगर रिजर्व की जिम्मेदारी से नवाजा गया. खैर निदेशक का कद बढ़ाया गया तो तत्कालीन PCCF वाइल्डलाइफ और Hoff भी सेवानिवृत हो गए..लेकिन मामला जस का तस बना रहा.
इस मामले में रिटायर्ड आईएएस अधिकारी रामास्वामी से भी जांच कराई गई, लेकिन इनकी जांच कई मायनों में अधूरी मानी गई. शायद यही कारण है कि विभागीय मंत्री ने एक नई जांच करने का उसे दौरान भरोसा दिलाया.
फिलहाल स्थिति यह है कि वन शहीद दिवस पर शहीद स्मारक में कुल 54 शहीदों के नाम पट्टिका में दर्ज किए गए हैं. इसमें चार वन कर्मी ऐसे हैं जिन्हें साल 2026 में उनके योगदान को लेकर शाहिद के रूप में इस बोर्ड में जगह मिली, लेकिन राजाजी टाइगर रिजर्व में वाहन ट्रायल के दौरान करने वाले वन कर्मियों को इसमें जगह नहीं मिल पाई.
इस मामले में प्रमुख वन संरक्षक हाफ से भी बात करने का प्रयास किया गया लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो पाया, लेकिन शहीद स्मारक के बोर्ड में इन कर्मचारियों का नाम नहीं होने से यह तो साफ है कि ढाई साल बाद भी अब तक इन कर्मचारियों की मौत का मामला शहीदों के रूप में दर्ज नहीं हो पाया है. इस दुर्घटना को लेकर जांच और कार्रवाई सिर्फ फाइलों में ही घूम रही है.
